Thursday, 29 December 2011

-------------------तुम पर हमारी मुहर लगी है-----------------
(मेरे हमवतनों को समर्पित,जो त्रस्त,पस्त हैं)
तुम्हारे मालिक हुआ करते हैं हम,
तुम पर हमारी मुहर लगी है;
इस बार भी आओ,जरूर आना,
तमीज-ओ-तहजीब अपने साथ लाना;
अवाम के दस्त-ओ-दिल में इस दफा
जमे शोलों की पक्की खबर लगी है;
..........जारी........................आ

Tuesday, 27 December 2011

---------"और क्या देखना"-------------
अब जमानें में और क्या देखना है बाकि
दिखा घर में ही सारा संसार बाकि;
चिता सजा रहें सब अपनी-अपनी
बस आग का खुद लगना है बाकि;
आशियां कैसे कह दें इन दीवारों को
अभी दिल का बसेरा होना है बाकि;
रहने के लायक अब शहर रहा नहीं
बस जंगलों से गुजरना रहा है बाकि;
अब तक किया और भी कर लें
धोने को पाप तीरथ हैं बाकि;
दोस्त,बहलना ना उनकी मीठी बातों से
अभी तो छुरी का चलना है बाकि;
होश में रहता हूं तब तलक मैं
मय जब तलक जिगर में रहती है बाकि;
(सम्प्रति आपके इस दोस्त की,मय से मेरा कोइ वास्ता नही)

Friday, 23 December 2011

‎--------------------नया वर्ष ???-----------------------
आ रही है बास जो
वो नव वर्ष की गंध है,
वही पुराना मजमून
नए लिफाफे में बंद है;
उन्के लिए नया साल क्या
चुल्हे जिनके लकड़ी से तंग हैं,
आदत है उन्हे बु-ए-राख की
जिसमे आती नहीं सुगंध है;
किसी के हाथों की लकीरें फैली
तो किसी के हाथ तंग हैं,
क्या नया क्या पुराना
वही रोटी की पुरानी जंग है;
आस का पंछी क्या सोचे
क्या जानकर वो उपर उड़े,
कि हर बार वो गिरता यूं
जैसे कटती पतंग है;
एक तो गम हैं ज्यादा
और खुशियां चंद हैं,
उपर से सुख की गति तेज
और दुख चलता मंद है;
कुछ पल का जो हम
दौर-ए जश्न मनाते हैं,
बीते दिनों की टाट पर
लगाते मखमल का पैबंद हैं;
(मेरे तमाम वंचित हम वतनों को;शर्मिंदा भी हूं
पर क्या करुं ,जो कर रहा हं वो कुछ भी नहीं)
‎--------------------नया वर्ष ???-----------------------
आ रही है बास जो
वो नव वर्ष की गंध है,
वही पुराना मजमून
नए लिफाफे में बंद है;
उन्के लिए नया साल क्या
चुल्हे जिनके लकड़ी से तंग हैं,
आदत है उन्हे बु-ए-राख की
जिसमे आती नहीं सुगंध है;
किसी के हाथों की लकीरें फैली
तो किसी के हाथ तंग हैं,
क्या नया क्या पुराना
वही रोटी की पुरानी जंग है;
आस का पंछी क्या सोचे
क्या जानकर वो उपर उड़े,
कि हर बार वो गिरता यूं
जैसे कटती पतंग है;
एक तो गम हैं ज्यादा
और खुशियां चंद हैं,
उपर से सुख की गति तेज
और दुख चलता मंद है;
कुछ पल का जो हम
दौर-ए जश्न मनाते हैं,
बीते दिनों की टाट पर
लगाते मखमल का पैबंद हैं;
(मेरे तमाम वंचित हम वतनों को;शर्मिंदा भी हूं
पर क्या करुं ,जो कर रहा हं वो कुछ भी नहीं)

Sunday, 18 December 2011

"मत दर कि दूनियां वाले तुझ पर पत्थर उछालते हैं.."

-------------------------"अब्र-नामा" से------------------------------
पहुंचोगे तुम साहिल पर
लाख जोर तुफां लगाए’
जो हो मौजों की लगन
चट्टानों से टकराने में;
गुलशन में तेरे भी
फूलों का बसेरा होगा,
जो लहू पुकारता बहेगा
कांटों पे चलने में;
आता है अकेला जिंदगी में
रोता,हमसफर कोई नहीं,
कारवां तो यूं ही बन जाएंगे
आगाज तो कर कदम बढ़ाने में;
मत डर कि दुनिया वाले
तुझ पे पत्थर उछालते हैं,
सारे काम आएंगे तेरे
एक दिन आशियां बनाने में;
------धन्यवाद------------
(२८-०४-१९९७)

Friday, 9 December 2011

प्यार मिलता नहीं
किस्सों की तरह,
मिलता है किश्तों में
चुकते कर्ज की तरह;
आते हैं जख्म सहलाने
सितमगर इस तरह,
जले में नमक
लगाने की तरह;
फरेब उनका था या
अश्कों का,पर निकले,
डोली में बैठी
दुल्हन की तरह;
कत्ल करनें में
तलवार की जरूरत क्या,
जुबां चलती है जो
खंजर की तरह;
कमी है न कसूर
झरनों का दोस्त,
जब सब प्यासे हैं
चातक की तरह;
आने से खिलते हैं
बाग-औ-चमन,
कौन है यहां
’अब्र’ की तरह;
(’अश्क-ए-अब्र’ का एक कतरा है,
 "अब्र-नामा जिसका चेहरा है)
आपके इस दोस्त ने abra-naama blog spot
में अपनी जगह पायी है...............................

Thursday, 8 December 2011

"अब्र-नामा": ----आ मेरे हमदम जरा

"अब्र-नामा": ----आ मेरे हमदम जरा: आ मेरे हमदम जराकी प्यार बातें करें, जा रही है जिंदगी दो-चार सही बातें करें; ’पल’ जो कल हो गया उसकी क्यूं शिकायतें करें, वस्ले-हिज्र को छोड़...

----आ मेरे हमदम जरा

आ मेरे हमदम जराकी
प्यार बातें करें,
जा रही है जिंदगी
दो-चार सही बातें करें;
’पल’ जो कल हो गया
उसकी क्यूं शिकायतें करें,
वस्ले-हिज्र को छोड़ कर
इंतजार की बातें करें;
फूल कांटा हो गया तो क्या
खाक हुआ गुलाब तो क्या,
पतझड़ कट जायेगा यूं ही
आ बहार की बातें करें;
काफिले चले गये आखिर
फासले कम होंगे क्या,
धड़कनों की हौसला-अफजाई को
आ रफ्तार की बातें करें;
मौहब्बत तो बस मौहब्बत है
जिस्म तो दीवार है,
इस पार के तलबगार सब
आ उस पार की बातें करें;
उस पार की बातें करें