Friday, 23 December 2011

‎--------------------नया वर्ष ???-----------------------
आ रही है बास जो
वो नव वर्ष की गंध है,
वही पुराना मजमून
नए लिफाफे में बंद है;
उन्के लिए नया साल क्या
चुल्हे जिनके लकड़ी से तंग हैं,
आदत है उन्हे बु-ए-राख की
जिसमे आती नहीं सुगंध है;
किसी के हाथों की लकीरें फैली
तो किसी के हाथ तंग हैं,
क्या नया क्या पुराना
वही रोटी की पुरानी जंग है;
आस का पंछी क्या सोचे
क्या जानकर वो उपर उड़े,
कि हर बार वो गिरता यूं
जैसे कटती पतंग है;
एक तो गम हैं ज्यादा
और खुशियां चंद हैं,
उपर से सुख की गति तेज
और दुख चलता मंद है;
कुछ पल का जो हम
दौर-ए जश्न मनाते हैं,
बीते दिनों की टाट पर
लगाते मखमल का पैबंद हैं;
(मेरे तमाम वंचित हम वतनों को;शर्मिंदा भी हूं
पर क्या करुं ,जो कर रहा हं वो कुछ भी नहीं)

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