Friday, 9 December 2011

प्यार मिलता नहीं
किस्सों की तरह,
मिलता है किश्तों में
चुकते कर्ज की तरह;
आते हैं जख्म सहलाने
सितमगर इस तरह,
जले में नमक
लगाने की तरह;
फरेब उनका था या
अश्कों का,पर निकले,
डोली में बैठी
दुल्हन की तरह;
कत्ल करनें में
तलवार की जरूरत क्या,
जुबां चलती है जो
खंजर की तरह;
कमी है न कसूर
झरनों का दोस्त,
जब सब प्यासे हैं
चातक की तरह;
आने से खिलते हैं
बाग-औ-चमन,
कौन है यहां
’अब्र’ की तरह;
(’अश्क-ए-अब्र’ का एक कतरा है,
 "अब्र-नामा जिसका चेहरा है)
आपके इस दोस्त ने abra-naama blog spot
में अपनी जगह पायी है...............................

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